💥एक माह से जारी है उत्पाती बंदरों का तांडव।
💥घर घुस कर उठा ले जा रहे खाने का सामान।
💥भगाने पर हो रहे आक्रामक।
💥अकेले पाकर अचानक कर रहे हमला।
💥बंदरों के हमले में कई गंभीर रूप से घायल।
💥 वन विभाग की कार्यशैली पर उठ रहे सवाल।
तहतक न्यूज/रायगढ़, छत्तीसगढ़। कथित विकास की इतिहास रचने वाला मानव समाज जो अपने आपको उन्नत, समृद्ध, सुरक्षित और शक्तिशाली होने का घमंड या दावा करता है, वो उस वक्त बेमानी हो जाता है जब जंगल के जानवर इनकी ज्यादती से बौरा कर बस्ती में आतंक मचाने लगते हैं। हम बात कर रहे हैं एक ऐसे गाँव की जहाँ के निवासी सुख शांति से से अपना जीवन गुजर-बसर कर रहे थे, लेकिन न जाने गाँव में ऐसी कौन सी आफत आयी कि कुछ बन्दरों ने पूरे क्षेत्र में तहलका मचा दिया है। बीते दो-तीन सप्ताह से पागलों की तरह ये बन्दर जिसे पा रहे हैं उसी के ऊपर अचानक हमला कर बुरी तरह से लहू-लुहान कर दे रहे हैं। लोग अपना बचाव तक नहीं कर पा रहे हैं। वहीं, वन विभाग भी इनके सामने बेबस, लाचार और नकारा साबित हो रहा है।
बता दें कि जिला मुख्यालय रायगढ़ से महज 10 किलोमीटर दूर रायगढ़-घरघोड़ा मुख्यमार्ग में स्थित ग्राम पंचायत लाखा के आश्रित ग्राम चिराईपानी के ग्रामीण पिछले तीन-चार सप्ताह से जंगली बंदरों के आतंक से जूझ रहे हैं। शुरुआती दौर में भोजन की तलाश में ये घरों में घुस कर खाने का सामान उठा ले जाते थे। भगाने पर अब ये उग्र व आक्रामक होने लगे हैं और लोगों के ऊपर हमले भी करने लगे हैं। शुरुआत में जहाँ रवि किसान पिता महेत्तर किसान इनके हमले का शिकार हुआ और एक चार साल की बच्ची निधि यादव पिता संजय यादव घायल हुई वहीं, बीते गुरुवार को श्रीमती कमला पंडा पति लक्ष्मण पंडा नहाने के लिए नाला जा रही थीं, तभी एक आक्रामक बंदर ने अचानक हमला कर दिया।हमले में उनके सिर और हाथ पर गंभीर चोटें आईं। सिर पर 12 टांके लगाने पड़े। इसी क्रम में शुक्रवार को फिर एक बंदर ने गांव के निवासी श्याम सुंदर डनसेना पर हमला कर उन्हें लहू -लुहान कर दिया। इस तरह से पिछले कुछ दिनों से लगातार हो रहे हमलों ने पूरे गांव में भय और दहशत का माहौल पैदा कर दिया है।


कोरोना काल के लॉक डाउन जैसी हालात
ग्रामीणों के अनुसार, पहले बंदर महिलाओं और बच्चों को निशाना बना रहे थे, लेकिन अब पुरुषों पर भी हमले शुरू हो गए हैं। बंदरों के आतंक से भयभीत लोग घरों से बाहर निकलने में हिचकिचा रहे हैं। महिलाएं जहाँ अपने दैनिक कार्यों के लिए बाहर निकलने में घबरा रही हैं वहीं बच्चे स्कूल जाने से कतराने लगे हैं।

गाँव में लॉक डाउन जैसी स्थिति निर्मित हो गयी है। गली-मोहल्ले जो कभी बच्चों, बुजुर्गों से गुलजार हुआ करते थे अब बंदरों के आतंक से सन्नाटा पसरा हुआ है। गाँव में अब पलायन जैसे हालात बनने लगे हैं और जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हो गया है।
वन विभाग पर उदासीनता का आरोप
ग्रामीणों ने बताया कि वन विभाग द्वारा गाँव में बंदरों को पकड़ने के लिए तीन-चार पिंजरे छोड़ दिए गए हैं, जिसमें शुरू-शुरू में चार-पाँच बन्दर पकड़े गए, लेकिन लगातार हमला करने वाले आक्रामक बंदर अभी भी पकड़ से बाहर हैं। ग्राम वासियों का आरोप है कि वन विभाग ग्रामीणों की सुरक्षा को लेकर जरा भी गंभीर नहीं है। गाँव में पिंजरे छोड़ बन्दर पकड़ने का जिम्मा गाँव वालों को ही सौंप दिया गया है। गाँव वालों की माँग है कि वन विभाग हम ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए तत्काल और प्रभावी कदम उठाये।
क्षेत्र में स्थापित औद्योगिक इकाईयां जिम्मेदार
ग्राम वासियों का कहना है कि इस क्षेत्र में जब से उद्योगों की स्थापना के लिए जंगल उजाड़ दिए गए हैं तब से वन्य पशु प्रभावित हुए हैं। उद्योगों द्वारा चिमनीयों से बेतहाशा प्रदूषण उड़ाए जाने से बचे-खुचे पेड़ों में फल-फूल भी नहीं लग रहे हैं, जंगलों में प्राकृतिक भोजन नहीं मिलने के कारण भूखे-प्यासे ये जानवर बस्तियों में घुस रहे हैं और आक्रामक होकर हमले कर रहे हैं।
ग्रामीणों ने यह भी कहा है कि यदि समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई, तो जानवर और इंसानों के बीच कभी भी टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसलिए उन्होंने जिला प्रशासन से तत्काल विशेष रेस्क्यू अभियान शुरू कर आक्रामक बंदर को पकड़ने तथा भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों इसके लिए ठोस कदम उठाये जाने की मांग की है।
फोन तक रिसीव करना मुनासिब नहीं समझ रहे जिम्मेदार अधिकारी
एक माह से बंदरों के बढ़ते आतंक से हलाकान ग्रामीणों के समस्या निवारण न हो पाने को लेकर हकीकत की तहकीकात में तहतक की जानकारी लेने के लिए जब "तहतक न्यूज" ने वन क्षेत्रपाल राजकुमार सारथी से उनके मोबाईल पर संपर्क किया तो पूरी रिंग जाने के बाद भी बात नहीं हो पायी। एक-सवा घंटे बाद पुनः संपर्क किया गया, किन्तु इस बार भी उन्होंने रिसीव करना उचित नहीं समझा और न ही कालबेक करने की जिम्मेदारी निभायी। इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि पीड़ित ग्रामीणों का आरोप अपनी जगह कितना सही है? वहीं, दूसरी ओर आम जनता के मन में यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या..वन विभाग में मैदानी स्तर के अधिकारी आला अधिकारियों के नियंत्रण से बाहर हैं?



