💥मौसीघर (गुंडिचा मंदिर) से श्रीमंदिर लौटे महाप्रभु, कल होगा छत्तीसगढ़ का अद्वितीय 'सोनाभेष' दर्शन।
तहतक न्यूज/रायगढ़, छत्तीसगढ़। रियासतकालीन श्री जगन्नाथ मंदिर रायगढ़ की पुरानी गौरवशाली परंपरा के अनुरूप आषाढ़ शुक्ल दशमी के पावन अवसर पर आज भगवान श्रीजगन्नाथ, बड़े भाई श्रीबलभद्र एवं बहन देवी सुभद्रा की बाहुड़ा (वापसी) रथयात्रा श्रद्धा, आस्था और वैदिक रीति-रिवाजों के साथ निकली। आठ दिनों तक मौसीघर (गुंडिचा मंदिर) में प्रवास के पश्चात महाप्रभु पुनः अपने श्रीमंदिर लौटे।

सनातन परंपरा में बाहुड़ा यात्रा केवल भगवान की वापसी नहीं, बल्कि सृष्टि-चक्र की पूर्णता, धर्म की पुनर्स्थापना तथा जीवात्मा के परमात्मा से पुनर्मिलन का दिव्य प्रतीक मानी जाती है। शास्त्रों में भगवान श्री जगन्नाथ को समस्त चराचर जगत का नाथ एवं कलियुग के सर्वसुलभ आराध्य के रूप में वर्णित किया गया है। उनकी रथयात्रा सामाजिक समरसता, सेवा, समानता और विश्वबंधुत्व का ऐसा संदेश देती है, जहाँ जाति, वर्ग, भाषा और क्षेत्र के सभी भेद स्वतः समाप्त हो जाते हैं और प्रत्येक श्रद्धालु को महाप्रभु का रथ खींचने का समान सौभाग्य प्राप्त होता है।

आज सायं 4 बजे महाप्रभु श्री जगन्नाथ, श्री बलभद्र एवं माता सुभद्रा रथारूढ़ होकर मौसीघर से श्रीमंदिर के लिए प्रस्थान किये। भव्य वापसी यात्रा गांजाचौक, हटरी चौक, गद्दी चौक एवं पैलेस रोड होते हुए मोतीमहल स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर पहुँची। मार्ग में विभिन्न स्थानों पर भजन-कीर्तन, पुष्पवर्षा एवं महाआरती के साथ श्रद्धालुओं ने महाप्रभु का स्वागत किया। पैलेस रोड में पंडित ब्रजेश्वर मिश्र, श्री गोपीनाथ जीव मंदिर तथा श्री जगन्नाथ मंदिर के समक्ष उत्कल सांस्कृतिक सेवा समिति की सांस्कृतिक इकाई "उत्कलिका" द्वारा विशेष महाआरती एवं स्वागत समारोह आयोजित किया गया।

कल होगा राजकीय स्वरूप में दुर्लभ 'सोनाभेष' दर्शन
आषाढ़ शुक्ल एकादशी, 25 जुलाई को सायं 7 बजे महाप्रभु का अत्यंत आकर्षक एवं दुर्लभ 'सोनाभेष' (स्वर्णवेष) सम्पन्न होगा। इस अवसर पर भगवान श्री जगन्नाथ स्वर्ण मुकुट, स्वर्ण आभूषणों एवं दिव्य आयुधों से अलंकृत पूर्ण राजकीय स्वरूप में भक्तों को दर्शन देंगे। पुरी श्रीमंदिर की परंपरा के अनुरूप आयोजित होने वाला यह अलौकिक आयोजन छत्तीसगढ़ में केवल रायगढ़ के रियासतकालीन श्री जगन्नाथ मंदिर में ही सम्पन्न होता है, जो इसकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है।
इस दिन महाप्रभु एवं माता महालक्ष्मी को विशेष रूप से रसगुल्ले का भोग अर्पित किया जाता है। हरिशयनी एकादशी से भगवान श्रीहरि चार माह की योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। इसी के साथ चातुर्मास प्रारंभ होता है, जिसके दौरान विवाह, गृहप्रवेश, सगाई, यज्ञोपवीत, शिलान्यास सहित अधिकांश वैदिक मांगलिक संस्कार परंपरानुसार स्थगित रहते हैं और देवउठनी एकादशी के पश्चात पुनः प्रारंभ होते हैं। रायगढ़ की ऐतिहासिक रथयात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि नगर की सांस्कृतिक पहचान, उत्कल परंपरा और सामाजिक एकता का जीवंत उत्सव है। प्रत्येक वर्ष हजारों श्रद्धालु महाप्रभु के दर्शन एवं रथ खींचकर स्वयं को धन्य मानते हैं।
श्री जगन्नाथ मंदिर ट्रस्ट, उत्कल सांस्कृतिक सेवा समिति एवं समस्त आयोजन समिति ने सभी श्रद्धालुओं से बाहुड़ा रथयात्रा एवं सोनाभेष महोत्सव में सपरिवार सम्मिलित होकर महाप्रभु का आशीर्वाद प्राप्त करने तथा रायगढ़ की गौरवशाली रियासतकालीन परंपरा को आगे बढ़ाने का आग्रह किया है।


