तहतक न्यूज/रायगढ़, छत्तीसगढ़। हिंदू धर्म में शरद पूर्णिमा (जिसे कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा भी कहा जाता है) का विशेष धार्मिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व है। यह आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाई जाती है और इसे सभी पूर्णिमाओं में सबसे श्रेष्ठ और चमकीली माना जाता है। इस रात चंद्रमा अपनी सभी 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है। मान्यताओं के अनुसार, इस रात चांद की किरणों से अमृत वर्षा होती है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा के दिन ही समुद्र मंथन से माँ लक्ष्मी की उत्पत्ति हुई थी। माना जाता है कि इस रात देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करती हैं और जो लोग रात्रि जागरण कर रहे होते हैं, उन्हें सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। इसी कारण इसे 'कोजागरी पूर्णिमा' (कौन जाग रहा है) भी कहते हैं। द्वापर युग में इसी रात को कृष्ण ने वृंदावन में गोपियों के संग महारास रचाया था, जिसे 'रास पूर्णिमा' के रूप में याद किया जाता है।
इस रात खुले आसमान के नीचे दूध, चावल और चीनी से बनी खीर रखने का विधान है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, इस दिन चंद्रमा पृथ्वी के सबसे करीब होता है और इसकी औषधीय किरणों में कूलिंग और वेलनेस एनर्जी सबसे ज्यादा होती है। जब यह खीर रात भर चांदनी की रोशनी में रहती है, तो इसमें ऐसे रासायनिक बदलाव होते हैं जो हमारे पाचन तंत्र, त्वचा और मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद माने जाते हैं। अगले दिन इसे सुबह प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है, लेकिन रायगढ़ जिले के कुछ ऐसे भी हिस्से हैं जहाँ के निवासी प्रकृति प्रदत्त इस अनमोल उपहार से वंचित कर दिए गए हैं।
बता दें कि, रायगढ़-घरघोड़ा मार्ग के बीच स्थित लाखा, चिराईपानी, पाली, देलारी, गौरमुड़ी, सराईपाली गदगांव, शिवपुरी, गेरवानी, तराईमाल, पूँजीपथरा जैसे अनेकों वनाँचल गाँव हैं जो प्रदूषणकारी उद्योगों की लापरवाही और सीनाजोरी का खामियाजा भुगत रहे हैं। उद्योगों से निकलने वाला जहरीला फ्लाई ऐश जहाँ स्थानीय निवासियों के लिए जान का जोखिम बना हुआ है वहीं, उद्योग प्रबंधनों के गले का हड्डी साबित हो रहा है। यही कारण है कि क्षेत्र के सारे उद्योग पर्यावरणीय नियमों को ठेंगा दिखाते हुए ई.एस.पी. बंद कर किलन और चिमनियों से दिन-दहाड़े फ्लाई ऐश छोड़ रहे हैं। इससे पूरे वातावरण में ऐसा लगता है जैसे घना कोहरा छाया हुआ हो। ऐसा नहीं है कि फ्लाई ऐश केवल बाहर में उड़ रहा है बल्कि घर के अंदर बंद अलमारियों के भीतर तक घुस कर कपड़ों को बर्बाद कर रहे हैं। यही नहीं, लोग जब सुबह उठते हैं तो ऐसे खांसते हैं जैसे दमा के मरीज हों। थूकने पर काले रंग का कफ निकलता है। अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि लोग यहाँ किस कदर कीड़े-मकोड़ों की तरह जीवन गुजारते हुए धीरे-धीरे मौत की ओर बढ़ रहे हैं। इन परिस्थितियों में शरद पूर्णिमा के अवसर पर लोग भला खीर को कैसे छत पर रख सकेंगे?
दिखावे के सामाजिक हित के कार्य कर अपनी ही पीठ थपथपाने वाले कम्पनियाँ अगर साल में एक बार शरद पूर्णिमा में एक रात भी प्रदूषण रोक लेते तो शायद लोगों को अमृत रूपी औषधियुक्त खीर सेवन करने को मिल जाता और उक्त कंपनियों को स्वास्थ्य शिविर में कथित लाखों खर्च करने की जरुरत भी नहीं पड़ती।




