
तहतक न्यूज/जमालपुर, बिहार।
आनन्द मार्ग प्रचारक संघ द्वारा धर्म महासम्मेलन का तीन दिवसीय आयोजन दिनांक 24, 25 एवं 26 अक्टूबर 2025 तक आयोजित की गई है। इस आयोजन में अनेक देशों से आनंद मार्ग के अनुयायी हजारों की संख्या में भाग ले रहे हैं, जिसमें भारत के विभिन्न राज्यों सहित छत्तीसगढ़ के अनेक जिलों से भक्तगण इस पावन अवसर का लाभ उठाने जुटे हुए हैं।

प्रकृति की सुरम्य वादियों के मध्य स्थित आध्यात्मिक केंद्र “आनंद सम्भूति मास्टर यूनिट, अमझर” के कोलकाली मैदान में आयोजित भव्य धर्म महासम्मेलन के दूसरे दिवस का कार्यक्रम आध्यात्मिक ऊर्जा और उत्साह से परिपूर्ण रहा। दिन का शुभारंभ पांचजन्य, गुरु सकाश, सामूहिक साधना, आसन, कौशिकी और तांडव अभ्यास से हुआ। भुक्ति प्रधानों की बैठक का संचालन महासचिव आचार्य अभिरामानंद अवधूत की अध्यक्षता में किया गया।

इसके उपरांत, पुरोधा प्रमुख जी के आगमन पर आनंद मार्ग सेवा दल के समर्पित स्वयंसेवकों ने उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर प्रदान कर गरिमामय स्वागत किया। हरि परिमंडल गोष्ठी (महिला विभाग) के अंतर्गत आचार्या अवधूतिका आनंद आराधना के नेतृत्व में 22 साधिका बहनों ने कौशिकी नृत्य की भावपूर्ण प्रस्तुति दी, जिसने सभी उपस्थित जनों को मंत्रमुग्ध कर दिया। वहीं हरि परिमंडल गोष्ठी (सेवा धर्म मिशन) के तहत आचार्य सुष्मितानंद अवधूत के निर्देशन में 16 बाल साधकों ने जोश और ऊर्जा से परिपूर्ण तांडव नृत्य प्रस्तुत किया, जिसने पूरे वातावरण को ओजस्विता और आध्यात्मिक उत्साह से भर दिया। कार्यक्रम के दौरान प्रभात संगीत संख्या 806 एवं 807 का भावनात्मक अनुवाद तीन भाषाओं, हिंदी में श्री प्रद्युम्न नारायण जी, अंग्रेजी में आचार्य विमलानंद अवधूत तथा बांग्ला में आचार्य रागमयानन्द अवधूत द्वारा किया गया।

तदोपरांत आचार्य जगदात्मानंद अवधूत ने अपने मधुर कंठ से “प्रभु ह्म्म अ चलो तोरे आस म” प्रभात संगीत का सुमधुर गायन प्रस्तुत किया, जिससे संपूर्ण वातावरण भक्ति और आनंद की भावधारा में सराबोर हो गया। मुख्य प्रवचन में श्रद्धेय प्रमुख आचार्य विश्वदेवानंद अवधूत ने “भक्ति की अवस्थाओं के भेद” के विषय में विस्तार पूर्वक जानकारी देते हुए कहा कि

भक्ति अनेक रूपों में अभिव्यक्त होती है। इसका मूल है श्रद्धा, और श्रद्धा का आधार है प्रेम। प्रेम का अर्थ है — अखंड सत्ता के प्रति आकर्षण और इसका विलोम है काम। उन्होंने रामचरितमानस का सूत्र उद्धृत करते हुए आगे बताया कि यदि हम प्रेम नहीं करते, तो श्रद्धा भी नहीं हो सकती। श्रद्धालु की पहचान है — वह कहता है, “प्रभु! तुम्हारे बिना मेरा कोई नहीं।”
बता दें कि श्री श्री आनन्दमूर्ति (प्रभात रंजन सरकार) द्वारा सन् 1955 में स्थापित आनन्द मार्ग प्रचारक संघ आज विश्वभर में योग, ध्यान, शिक्षा और मानव सेवा के माध्यम से एक समग्र समाज निर्माण के लिए कार्यरत है। संघ का मूल उद्देश्य है “स्वयं की साक्षात्कार और विश्व की सेवा”

विश्वभर के ध्यान केंद्रों और योग प्रशिक्षण संस्थानों में लाखों साधक ध्यान, प्राणायाम और आध्यात्मिक साधना द्वारा जीवन में संतुलन और शांति का अनुभव कर रहे हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में संघ द्वारा संचालित नवमानवतावादी विद्यालयों में बच्चों को नैतिकता, करुणा, पर्यावरण-चेतना और सेवा भावना की शिक्षा दी जा रही है।
संघ की सेवा शाखाएँ AMURT (Ananda Marga Universal Relief Team) और AMURTEL (महिला सेवा शाखा) विश्व के अनेक देशों में आपदा राहत, स्वास्थ्य सेवा, भोजन वितरण, मातृ-शिशु कल्याण और पुनर्वास कार्यों में सक्रिय हैं तथा ग्रामीण विकास के क्षेत्र में संघ, PROUT (Progressive Utilization Theory) के सिद्धांतों पर आधारित आत्मनिर्भर और सहयोगी समाज व्यवस्था के निर्माण में भी कार्यरत है।
वर्तमान में आनन्द मार्ग प्रचारक संघ की गतिविधियाँ 180 से अधिक देशों में संचालित हैं, जो आध्यात्मिकता, शिक्षा, सेवा और सामाजिक पुनर्निर्माण के क्षेत्र में विश्वव्यापी योगदान दे रही हैं।
