
तहतक न्यूज/रायगढ़, छत्तीसगढ़। प्रकृति के साथ छेड़छाड़ कर विज्ञान कितना भी कथित तरक्की कर ले, सुख सुविधाओं के विकास के नाम पर प्रकृति प्रदत्त निःशुल्क उपहारों के स्वरुप को बदल मनमानी करने लगे तो निश्चित ही उसकी दिशा विकास नहीं विनाश की ओर जाती है। आपको बता दें कि औद्योगिक विकास की अंधी दौड़ में शामिल रायगढ़ जिले का पर्यावरण आज बेहद खतरनाक मोड़ पर है। प्रदूषण और भ्रष्टाचार का दानव हर छत पर खड़ा नंगा नाच रहा है। स्थानीय जनता जहाँ त्राहिमाम् कर रही है, वहीं उद्योगपतियों में धन कमाने की हायतौबा मची हुई है। कहीं किसानों की उपजाऊ जमींनें छिनी जा रही हैं, तो कहीं हरे-भरे जंगल उजाड़े जा रहे हैं।
अभी हाल ही की बात करें तो दो ऐसी खबरें आ रही हैं जिसे जानकर आप हैरान ही नहीं, बल्कि क्षुब्ध हो उठेंगे।
💥एयरपोर्ट निर्माण का जबरदस्त विरोध
पहली खबर यह है कि उपजाऊ कृषि भूमि के अधिग्रहण को लेकर जमकर विरोध किया जा रहा है, किसान आंदोलन की चेतावनी दे रहे हैं। रायगढ़ में प्रस्तावित एयरपोर्ट निर्माण के विरोध में छत्तीसगढ़ किसान सभा रायगढ़ के बैनर तले ग्राम जकेला में आसपास के कई गांवों के किसानों की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें एयरपोर्ट के लिए जमीन अधिग्रहण का कड़ा विरोध किया गया। बैठक में ग्राम औरदा, कोड़ातराई और बेलपाली के बड़ी संख्या में किसान शामिल हुए।
बैठक में किसानों ने एक स्वर में कहा कि उन्हें एयरपोर्ट की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि करीब 80 किलोमीटर की दूरी पर पहले से ही एयरपोर्ट मौजूद है, जिससे उनकी आवश्यकताएं पूरी हो जाती हैं। किसानों का कहना है कि सरकार यदि विकास के नाम पर उनकी उपजाऊ कृषि भूमि का अधिग्रहण करती है, तो इससे उनके सामने आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा।

किसानों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि खेती ही उनके जीवन-यापन का मुख्य साधन है। यदि उनकी जमीन ही उनसे छीन ली गई तो वे अपने परिवार का भरण-पोषण कैसे करेंगे। इस कारण किसान किसी भी कीमत पर अपनी जमीन देने को तैयार नहीं हैं।
बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि यदि जिला प्रशासन या सरकार जबरन जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू करती है, तो किसान सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे और बिना उनकी सहमति के जमीन लेने की कोशिश की गई तो व्यापक स्तर पर विरोध प्रदर्शन किया जाएगा। जिसकी पूरी जिम्मेदारी प्रशासन और सरकार की होगी।
💥और अब दूसरी बड़ी खबर में देखिये एनआर कंपनी की बुरी हरकत
दूसरी बड़ी खबर देलारी स्थित एनआर कंपनी की चल रही मनमानी और जबरदस्ती की है। बताया जा रहा है कि स्थानीय ग्रामीण आदिवासियों की आम निस्तारी के उपयोग में आने वाले नाले पर अतिक्रमण कर जबरन जल दोहन करने के बाद अब हरे-भरे जंगल में फ्लाई ऐश डाल कर पूरे क्षेत्र को बर्बाद कर रहा है। इस कंपनी से प्रभावित ग्रामों के ग्रामीण इसकी जनसुनवाई में यही उम्मीद कर समर्थन दिए थे कि हमारे क्षेत्र का विकास होगा, नौकरी मिलेगी, रोजगार बढ़ेगा, हाथ में चार पैसे आएंगे तो सुखमय जीवन गुजरेगा, लेकिन जनसुनवाई संपन्न क्या हुआ इसके तो गिरगिट की तरह रंग ही नहीं, पूरे तेवर ही बदल गए। सीधे-सादे गरीब ग्रामीण आदिवासी चिकनी-चुपड़ी मीठी बातों में आकर झूठे आश्वासनों के लॉलीपॉप थाम दोनों हाथ गँवा बैठे जिससे अब उन्हें न तो सिर धुनते बन रहा है और ना ही हाथ मलते बन रहा है।

अब बात करें जमीनी हकीकत की तो लोकतंत्र में जहाँ समानता के अधिकार की बात करते हैं वहाँ पूंजीवाद का ही बोलबाला है। कहने को भले ही जनता का राज है, लेकिन सच ठीक इसके विपरीत है। एक कहावत “जिसकी लाठी उसकी भैंस” की जगह अब “जिसकी पूंजी उसकी कुंजी” कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
