छत्तीसगढ़ में "प्रॉक्सी राजनीति" प्रथा पर लगा प्रतिबन्ध, चुने हुए प्रतिनिधि ही निभाएंगे भूमिका



💥 राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देशों के बाद छग सरकार ने जारी किया आदेश।
💥 महिला जनप्रतिनिधि की जगह पति या अन्य नहीं कर पाएंगे हस्तक्षेप।
💥 प्रॉक्सी राजनीति प्रथा से महिलाओं के सम्मान और अधिकारों का हो रहा उल्लंघन।
तहतक न्यूज/ छत्तीसगढ़।  प्रॉक्सी राजनीति यानि निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की जगह उनके पतियों या रिश्तेदारों द्वारा सत्ता संचालन करने की प्रथा पर अब कड़ाई से रोक लगा दी गई है। छत्तीसगढ़ सरकार ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देशों के बाद एक स्पष्ट आदेश जारी किया है, जिसके तहत अब किसी भी नगर निगम, नगरपालिका या नगर पंचायत में महिला जनप्रतिनिधि की जगह उनके पति या रिश्तेदार हस्तक्षेप नहीं कर पाएंगे।
       इस निर्णय का मुख्य उद्देश्य महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना और 'सरपंच-पति' या 'पार्षद-पति' जैसी प्रथाओं के कारण महिलाओं के सशक्तिकरण में आने वाली बाधाओं को दूर करना है। शासन ने स्थानीय निकायों को निर्देश दिया है कि आधिकारिक बैठकों और कार्यकालों में केवल निर्वाचित महिला प्रतिनिधि ही उपस्थित रहें। यदि कोई रिश्तेदार उनकी जगह काम करता पाया जाता है, तो संबंधितों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।
                  बता दें कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के संज्ञान में यह बात आई थी कि कई जगहों पर बैठकों में महिला जनप्रतिनिधि स्वयं उपस्थित न हो कर उनके पति या रिश्ते नातेदार शामिल हो रहे हैं, फैसले ले रहे हैं और प्रशासनिक कामकाज प्रभावित कर रहे हैं। इसे न केवल महिलाओं के सम्मान और अधिकारों का उल्लंघन माना गया, बल्कि संविधान में बताए गए स्थानीय स्वशासन और प्रतिनिधित्व के सिद्धांतों के खिलाफ भी करार दिया गया।
         राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की पीठ ने, जिसकी अध्यक्षता सदस्य प्रियांक कानूनगो कर रहे थे, मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 की धारा 12 के तहत इस पूरे मामले में छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों को नोटिस जारी किया था। आयोग ने साफ कहा है कि इस तरह की “प्रॉक्सी राजनीति” लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करती है और यह महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों पर सीधा प्रहार है।
                इसके बाद अब छत्तीसगढ़ सरकार के नगरीय प्रशासन विभाग ने सभी नगर निगम आयुक्तों और मुख्य नगर पालिका अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं। आदेश में कहा गया है कि जिन नगरीय निकायों में निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधियों के पारिवारिक रिश्तेदार या नातेदार प्रतिनिधि के रूप में कार्य कर रहे हैं, उनकी तत्काल समीक्षा की जाए। साथ ही सांसदों और विधायकों को भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देशों की जानकारी देकर उनका पालन सुनिश्चित कराया जाए।
           प्रॉक्सी राजनीति की तहतक जाकर देखें तो वास्तव में महिला जन प्रतिनिधि अपने सम्मान व अधिकारों से वंचित रह जाती थीं। यही नहीं, महिला सीट होने पर पुरुष अपने पत्नी को प्रत्याशी बना कर चुनाव में उतार देते थे और चुने जाने पर स्वयं प्रतिनिधि बन कर उनके अधिकारों का उपयोग कर राजनीति करते थे। इससे लोकतान्त्रिक व्यवस्था प्रभावित होती थी।  उल्लेखनीय है कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट भी “सरपंच पति” जैसी व्यवस्था को अवैधानिक और गैरकानूनी करार दे चुका है। शीर्ष अदालत ने कहा था कि निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की ओर से उनके पति या पुरुष रिश्तेदारों द्वारा अधिकारों का प्रयोग करना संविधान की भावना के खिलाफ है। उसी आधार पर अब नगरीय निकायों में भी इस व्यवस्था पर पूरी तरह रोक लगाई जा रही है। वैसे ग्रामीण क्षेत्रों में भी ग्राम पंचायतों में चल रही प्रॉक्सी राजनीति व्यवस्था पर प्रतिबन्ध लगाए जाने की जरुरत है ताकि, ग्रामीण महिला जन प्रतिनिधियों को भी उनका अधिकार मिले।

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