जल-जंगल और जमीन बचाने बीच सड़क पर दूधमुँहे बच्चों के साथ महिलाओं ने बितायी सर्द भरी रात

तहतक न्यूज/ रायगढ़, छत्तीसगढ़।
        जिले के आबो हवा में केवल विरोध के ही सुर लगातार गूंज रहे हैं। कोयला खदान को लेकर यहाँ के मूल निवासी आदिवासियों और शासन-प्रशासन के बीच तालमेल के बजाय टकराव की स्थिति निर्मित होती नजर आ रही है। अपने जल-जंगल और जमीन बचाने के लिए ग्रामीण आदिवासी अंबुजा कोल माइंस का पूरजोर विरोध कर रहे हैं।


      धरमजयगढ़ विकासखंड के पुरूंगा, सांभरसिंगा, कोकदार, तेन्दुमुड़ी आदि गांवों के सैकड़ों ग्रामीणों ने प्रस्तावित जनसुनवाई को रद्द करने की मांग को लेकर जिला मुख्यालय के सामने जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया और धरने पर बैठ गए। कंपनी की पर्यावरणीय स्वीकृति के लिए 11 नवंबर 2025 को जनसुनवाई निर्धारित है, जिसे निरस्त करने की माँग को लेकर ग्रामीण जिसमें महिलाएं भी चूल्हा-चौका त्याग अपने दूधमुँहे बच्चों के साथ सुबह से शामिल थीं, पूरी रात ठण्ड में बीच सड़क पर धरने पर बैठ गयीं। रायगढ़ जिले में गरीब और भोले-भाले आदिवासियों के ऐसे जबरदस्त विरोध प्रदर्शन की तस्वीर पहली बार देखने को मिली। सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि अपने पुरखों की जमीन-जायदाद छीने जाने का दर्द कितना कष्ट दायक होता है? इस विरोध प्रदर्शन को स्थानीय विधायक उमेश पटेल और लालजीत राठिया सहित पूर्व विधायक प्रकाश नायक का भी समर्थन मिला है।

उल्लेखनीय है कि उद्योगों और कोयला खदानों के प्रदूषण से पूरा जिला बुरी तरह से प्रभावित है। सड़क दुर्घटनायें, लूटपाट, चोरी, मारपीट जैसी आपराधिक घटनाएं, नशाखोरी, गंभीर बीमारियाँ आदि में काफी बढ़ोतरी हो रही है। फ्लाई ऐश व धूल से स्थानीय लोगों का स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है। जंगलों की कटाई से वन्य जीव-जंतु प्रभावित हो रहे हैं और मानव बस्ती का रुख कर रहे हैं। हाथी मानव द्वन्द आये दिन देखने को मिल रहे हैं। यही वजह है कि क्षेत्रीय ग्रामीण आदिवासी बगावत पर उतरने को मजबूर हो गए हैं और जनसुनवाई निरस्त करने की माँग पर अड़े हैं। भोले-भाले ग्रामीण आदिवासियों के मन में बारम्बार यही सवाल उठ रहा है कि जब हम लगातार विरोध कर रहे हैं तो जनसुनवाई कराने का तो कोई औचित्य ही नहीं है, फिर भी जनसुनवाई क्यों करायी जा रही है? वहाँ भी तो विरोध ही होगा।

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