कब थमेगी खाद की कालाबाजारी? डेढ़ से दोगुने कीमत पर खाद खरीदने को मजबूर हैं किसान

तहतक न्यूज/बरमकेला-रायगढ़, छत्तीसगढ़।
मजदूर और किसान जो ब्रिटिश काल से शोषण के शिकार होते आये हैं, आज भी उनका वही हाल है। देश की रीढ़ कहे जाने वाले किसानों को भले ही अन्नदाता जैसे मीठे शब्दों से महिमा मंडित कर तारीफों के चने के झाड़ में चढ़ा दिया जाता है लेकिन उसके चारों खाने चित गिरने की परवाह किसी को नहीं है। ये हम नहीं, प्रदेश के कई मंडियों में खाद की कमी होने की तस्वीरें बयां कर रही हैं। किसान अपने हिस्से की खाद पाने के लिए रोजाना सरकारी केंद्रों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उन्हें मायूस होकर लौटना पड़ रहा है। मजबूरी में ये किसान खुले बाजार से डेढ़ से दोगुना कीमत चुकाकर खाद खरीदने को विवश हैं।

मिल रही जानकारी के अनुसार सुदूर ग्रामीण अंचल के धान उपार्जन केंद्र दुलोपाली, उपमंडी सेवा सहकारी समिति मर्यादित पंजीयन क्रमांक 1550, काला खूंटा की स्थिति बेहद गंभीर हैं। यहां अधिकांश किसानों को पंजीकृत रकबे के हिसाब से खाद का पूरा हिस्सा नहीं मिल पा रहा है। कई किसानों को यूरिया पूरी मात्रा में नहीं दिया गया, तो कई D.A.P. के इंतज़ार में मंडी आते हैं और निराश होकर लौट जाते हैं। केंद्र के ऑपरेटर के मुताबिक मात्र 55-60 किसानों को वितरण होना बताया जा रहा है, जबकि हकीकत में यह संख्या सैकड़ों में है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर वास्तव में खाद की कमी है, तो फिर काला बाज़ारी में वही खाद इतनी आसानी से कैसे उपलब्ध है? सरकारी केंद्र पर यूरिया 266 रुपये बोरी, D.A.P. 1350 रुपये और पोटाश 1500 रुपये में मिलना तय है, लेकिन काला बाज़ारी में इन्हीं खादों के दाम क्रमशः 550 रुपये, 1850 रुपये और 1900 रुपये तक वसूले जा रहे हैं। आखिर यह गोरखधंधा प्रशासन की नाक के नीचे कैसे फल-फूल रहा है?

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