सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद कैंसर की दवाओं के दाम घटे, 9 नवंबर से लागू होंगी कीमतें


तहतक न्यूज/नई दिल्ली। भारत सरकार के राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) ने हाल ही में एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए कैंसर की 397 दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) में 90% से 93% तक की भारी कमी करने की घोषणा की है।
         सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट की कड़ी सख्ती और मुनाफाखोरी पर जताई गई आपत्ति के बाद, सरकार ने 137 गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं के व्यापार मार्जिन को 30% पर सीमित कर दिया है। इससे कुल 543 ब्रांडों और पैक के दामों में बदलाव किया गया है, जिसके तहत 397 जीवन रक्षक दवाओं की कीमतें बहुत कम हो गई हैं। सैमटेपा (Thiotepa) इंजेक्शन की कीमत ₹80,071 से घटकर अब मात्र ₹7,150 रह गई है। वहीं, पैलबोप्रो (Palbopro - 21 कैप्सूल) जो पहले ₹40,421 में मिलता था, वह अब सिर्फ ₹2,720 में उपलब्ध होगा। कैंसर के इलाज को किफायती बनाने वाला यह नया नियम पूरे देश में 9 नवंबर 2026 से लागू हो जाएगा।
       विदित हो कि, दवा निर्माताओं से लेकर खुदरा विक्रेताओं के बीच के मुनाफे को सीमित कर दिया गया है, जिससे मरीजों को आर्थिक राहत मिलेगी। इस कटौती में फेफड़े, कोलोरेक्टल, किडनी और स्तन कैंसर जैसे गंभीर इलाजों में इस्तेमाल होने वाली दवाएं शामिल हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों और रिपोर्ट्स के अनुसार, इस फैसले से कई दवाओं के दाम तो घट गए हैं, लेकिन कुछ बेहद महंगी और पेटेंटेड इम्यूनोथेरेपी की दवा कीट्रूडा भी शामिल है, जिसका इस्तेमाल 21 से ज्यादा तरह के कैंसर के इलाज में होता है। इसकी कीमत अभी भी 2,16,500 है। ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली रिबोसाइक्लिब की कीमत भी 24,435 पर बनी हुई है। इसके अलावा टैग्रिसो, टेसेंट्रिक, डार्जालेक्स और इम्फिंजी जैसी दवाओं के दामों में भी कोई बदलाव नहीं किया गया है। पेटेंट वाली दवाओं के दाम घटाना मुश्किल है, क्योंकि ये नई तकनीक और पेटेंट अधिकारों से जुड़ी होती हैं। कीमतें कम होने पर कंपनियां भारत में इनकी सप्लाई घटा या बंद कर सकती हैं।
        उल्लेखनीय है कि कैंसर और अन्य बीमारियों की दवाओं पर ज्यादा मुनाफा वसूलने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। हाल ही में कोर्ट में 13 हजार के इंजेक्शन को 1 लाख से ज्यादा में बेचने का मामला भी उठा था।
पूरा सिस्टम दवा निर्माताओं की कर रहा मदद
        सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत और रिटेलर को मिलने वाली कीमतों में भारी अंतर पर सरकार से सवाल किए। कोर्ट ने पूछा कि पूरा सिस्टम दवा निर्माताओं की मदद क्यों कर रहा है? कोर्ट ने कहा कि सरकार की नजरों के सामने यह सब हो रहा है,क्या इसे ऐसे ही बेलगाम चलने देना चाहिए? दोनों मामलों की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
एंटी-कैंसर दवाओं के ट्रेड मार्जिन पर भी सवाल
        सुप्रीम कोर्ट ने एंटी-कैंसर दवाओं का ट्रेड मार्जिन एमआरपी के 30% तक सीमित करने पर केंद्र के जवाब को मुश्किल से कुछ खुश होने लायक बताया था। कोर्ट ने सवाल किया था कि सरकार दूसरी दवाओं के ट्रेड मार्जिन की सीमा तय क्यों नहीं कर सकती। अस्पतालों के कैंसर दवाओं पर भारी मुनाफा जोड़े जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी आलोचना का सामना कर चुके केंद्र ने कहा था कि उसने एंटी-कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन एमआरपी के 30% तक सीमित करने का अहम फैसला लिया है। केंद्र के मुताबिक,इस फैसले से मरीजों को सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपए की बचत होने की उम्मीद है।
       बहरहाल, कैंसर की दवा के दाम घटने से कैंसर के मरीजों को काफी राहत मिलने की उम्मीद है। अब बात करें तहतक की तो कैंसर के अलावा और भी ऐसे कई गंभीर और साधारण बीमारियाँ हैं जिनकी दवाएँ काफी महँगी हैं। गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार को बीमारी और दवाओं के पीछे अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ता है। यही नहीं, टेस्ट के नाम पर भी लोगों को भारी राशि चुकानी पड़ती है। भ्रष्टाचार के इस दौर में अस्पताल, लैब और मेडिकल स्टोर के बीच चल रहा अवैध कमीशन का खेल भी आम नागरिकों के कमर तोड़ने में अहम भूमिका निभा रहा है। ऐसे में न केवल कैंसर बल्कि, अन्य बिमारियों सहित पूरी चिकित्सा व्यवस्था सवालों के कटघरे में है। सवाल उठता है कि जब कैंसर की दवाओं के कीमतों को कम किया जा सकता है तो अन्य बिमारियों की दवाओं की कीमतें व अन्य शुल्क कम क्यों नहीं हो सकतीं ?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *