लद्दाख पहुँचा लैलूंगा का "केलो" जैविक खुशबूदार जवाफूल चावल

तहतक न्यूज/लैलूंगा-रायगढ़, छत्तीसगढ़। स्वादिष्ट और खुशबूदार चावल की बात करें तो जवाफूल चावल का कोई जवाब नहीं। यह अपनी तेज सुगंध, छोटे दाने और बेहतरीन स्वाद के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है। यही कारण है कि रायगढ़ से भेजा गया "केलो" जैविक जवाफूल चावल लद्दाख के कारगिल जिले के गरकोन गांव तक पहुंच गया है। लद्दाख में पार्सल पहुंचने पर स्थानीय ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति में इसे खोला गया। चावल की खुशबू और गुणवत्ता ने सभी को प्रभावित किया और लोगों ने इसकी सराहना की। लद्दाखी परंपरा के अनुसार ‘जुले-जुले’ कहकर स्थानीय लोगों ने आभार जताया। उन्होंने कहा कि इतनी दूर से चावल मिलना उनके लिए एक अलग और खास अनुभव है। लद्दाख से साझा किए गए वीडियो में स्थानीय नागरिकों ने कहा कि “हम रायगढ़ जिला प्रशासन के बहुत शुक्रगुजार हैं, जिन्होंने हमारी मांग पर ‘सुगंधित चावल यहां लद्दाख तक पहुंचाया। इसके लिए हम उनका विशेष धन्यवाद करते हैं।
          बता दें कि कुछ समय पहले गरकोन गांव के एक उपभोक्ता द्वारा वीडियो के माध्यम से रायगढ़ जिले के लैलूंगा में उत्पादित सुगंधित चावल के प्रति रुचि व्यक्त की गई थी। इसके बाद पहल करते हुए रायगढ़ से चावल और उसके बीज पार्सल के जरिए भेजे गए। कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि लैलूंगा क्षेत्र में किसान सुगंधित ‘जवाफूल’ चावल की खेती कर रहे हैं। इसकी खेती के लिए 5 किसान उत्पादक संगठन का गठन किया गया है, जिनमें 1000 से अधिक किसान जुड़े हुए हैं और संगठित रूप से इस फसल का उत्पादन कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि ‘जवाफूल’ चावल के प्रचार-प्रसार के लिए यूट्यूब चैनल के माध्यम से भी जानकारी साझा की जा रही है।
          विदित हो कि प्रशासन के निर्देश पर कृषि विभाग द्वारा इस फसल को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और बीज उपलब्ध कराया जा रहा है। साथ ही किसान समूहों और एफपीओ के माध्यम से उत्पादन और विपणन को संगठित किया जा रहा है। ‘केलो’ जैविक जवाफूल चावल अब लैलूंगा की एक मजबूत पहचान बन चुका है। यह न केवल किसानों की आय बढ़ाने में सहायक है, बल्कि क्षेत्र को नई पहचान भी दिला रहा है। जवाफूल धान की प्रमुख विशेषता इसकी प्राकृतिक सुगंध और स्वाद है, जो लैलूंगा क्षेत्र की विशेष जलवायु में विकसित होती है।  ‘केलो’ जैविक जवाफूल चावल की मांग अब छत्तीसगढ़ से बाहर भी बढ़ रही है। बेंगलुरु, चेन्नई, तेलंगाना, लद्दाख और कारगिल जैसे क्षेत्रों में इसकी मांग देखी जा रही है।
जवाफूल  चावल, जिसे स्थानीय रूप से जीराफूल भी कहा जाता है, मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ के रायगढ़ और दंतेवाड़ा क्षेत्रों की एक प्रीमियम सुगंधित किस्म है।
जवाफूल चावल की मुख्य विशेषताएं
इसके दाने बहुत छोटे, पतले और सफेद होते हैं। पकने के बाद यह चावल काफी मुलायम और खिला-खिला रहता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी प्राकृतिक खुशबू है, जो पकते समय पूरे घर में फैल जाती है।
शुगर के मरीजों के लिए लाभदायक
यह चावल सेहत के लिए बहुत अच्छा माना जाता है। इसमें आयरन, मैग्नीशियम और फास्फोरस जैसे खनिज प्रचुर मात्रा में होते हैं। साथ ही, इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI) कम होता है, जो रक्त शर्करा (sugar) को नियंत्रित रखने में मदद करता है।
पाचन में आसान
यह अन्य किस्मों की तुलना में जल्दी और आसानी से पच जाता है, जिससे यह दैनिक भोजन के लिए एक उत्तम विकल्प है।
जैविक खेती
जवाफूल की खेती अक्सर जैविक तरीके से की जाती है। स्थानीय किसानों के अनुसार, रासायनिक खादों का उपयोग करने से इसकी खुशबू और स्वाद कम हो जाता है, इसलिए इसे बिना केमिकल के उगाया जाता है। अपनी खुशबू के कारण यह पुलाव, बिरयानी, खिचड़ी और विशेष त्योहारों के पकवान बनाने के लिए सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है।
GI टैग और बाजार मूल्य
छत्तीसगढ़ की इस विशेष किस्म के चावल को इसके अनूठे गुणों के कारण GI टैग भी प्राप्त है। बाजार में शुद्ध जवाफूल चावल की कीमत गुणवत्ता के आधार पर 100 से 150 रुपए प्रति किलो तक हो सकती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *