
💥 चिराईपानी-गेरवानी सड़क बदहाल, वाहनों के पीछे उड़ते धूल से ग्रामीण हलाकान।
💥 आंदोलन करने पर थमा देते हैं आश्वासन का झुनझुना।
💥पक्की सड़क बनवाने का लिखित में किया था वादा, स्लेग चूरा डाल कर दी लीपापोती।
तहतक न्यूज/रायगढ़, छत्तीसगढ़। जिले के पूँजीपथरा थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्रामीण इलाकों में स्थापित कुछ उद्योगों की मनमानी चरम पर है। अपने सामाजिक उत्तरदायित्वों से कोसों दूर मक्कारी पर उतर आये ये उद्योग जहाँ स्थानीय ग्रामीणों के ऊपर खुलकर अत्याचार कर रहे हैं वहीं, प्रशासन के अधिकारियों के निर्देशों की जमकर धज्जियाँ उड़ा रहे हैं। इससे प्रशासन की छवि तो धूमिल हो ही रही है, आश्वासन देने वाले अधिकारियों की चुप्पी पर भी सवाल उठ रहे हैं। जी हाँ, ये हम नहीं कह रहे, बल्कि चिराईपानी से गेरवानी जाने वाली सड़क पर उड़ती जहरीली धूल चीख-चीख कर बयां कर रही है।
आपको बता दें कि ग्राम चिराईपानी से गेरवानी आवागमन के लिए ग्रामवासियों द्वारा स्वयं की जमीन देकर कच्ची सड़क बनाई गयी थी और लोग आराम से आना-जाना करते थे। इस मार्ग से जुड़े कई प्लांट स्थापित हैं, जिसमें श्री ओम रुपेश, वजरान, महालक्ष्मी, रीयल वायर, सालासर (सिंघल), सुनील इस्पात आदि बड़ी कम्पनियाँ हैं। इन कंपनियों में 50 से 60 टन की लोडेड गाड़ियाँ चलती हैं, जिससे यह कच्ची सड़क बुरी तरह से जर्जर हो गयी है। बारिश के दिनों में ग्रामीण तो क्या ट्रकें भी मुश्किल से निकल पाती थीं। सड़क के निर्माण को लेकर ग्राम पंचायत लाखा और चिराईपानी के ग्रामीणों ने कई बार आंदोलन किया, आर्थिक नाकेबंदी की तब कहीं जाकर प्रशासन के अधिकारियों श्रीमति अनुराधा पटेल तहसीलदार तथा शिव कुमार डनसेना तहसीलदार रायगढ़ के हस्तक्षेप पर सम्बंधित कंपनियों के प्रतिनिधियों ने लिखित में आश्वासन दिया था कि एक माह में मजबूत सड़क बनवा कर देंगे, किन्तु एक, दो माह तो क्या छः माह बीत गए कोई ठोस सड़क नजर नहीं आ रहा। ग्रामवासियों की मानें तो गड्ढों को जैसे-तैसे पाटकर लीपापोती कर दिया गया है और स्लेग चूरा बिछा दिया गया है। पानी का छिड़काव भी नहीं करते। इस सड़क पर केवल कंपनी के ट्रकों का आना-जाना है बाकि पैदल और बाइक सवार धूल के उड़ते गुबारों के बीच चल नहीं पा रहे हैं। एक मात्र सुनील इस्पात द्वारा पानी का छिड़काव किया जा रहा है वह भी उसके ही क्षेत्र तक, बाकि कम्पनियाँ लकवाग्रस्त केवल मुँह ताक रही हैं। कुल मिलाकर ग्रामवासियों की यह सड़क कंपनी वालों के ही काम आ रही है और पीड़ित ग्रामीणों की समस्याएं अभी भी जस के तस बनी हुई हैं।
आम ग्रामीणों की समस्याओं की अनदेखी और कंपनियों की चल रही मनमानी की हकीकत की तहकीकात में तह तक जाकर देखा जाय तो रोजी-रोटी में व्यस्त आम ग्रामीण बार-बार के आंदोलन से तंग आ चुके हैं, अपना काम देखेंगे कि आये दिन कंपनी के पीछे भागेंगे, लेकिन इन ढीठ कम्पनियों को लज्जा तक नहीं आती। प्रशासनिक अधिकारियों की तो बात ही निराली है, सीधे व सरल भोले-भाले ग्रामीणों के समक्ष दिखावे के लिए कंपनी वालों को निर्देश देकर अपनी धौंस तो दिखा देते हैं, परन्तु बाद में चुप्पी साध लेते हैं। आखिर पीड़ित कब तक इनके आगे-पीछे दौड़े? थक हार कर अपनी बदनसीबी का रोना रोने के सिवा उसके पास और कुछ नहीं रह जाता। यही हाल चिराईपानी के वाशिंदों की हो गयी है। फिलहाल, लोगों के मन में यही सवाल उठने लगा है कि क्या अब जनता का हर आंदोलन तमनार जैसा हो तभी समस्याओं का निराकरण हो पायेगा?
