इथेनॉल परियोजनाओं के लिए केंद्र सरकार ने 4,687 करोड़ रूपये की ब्याज सब्सिडी को दी मंजूरी

तहतक न्यूज/नई दिल्ली। आप भी इथेनॉल से सम्बंधित प्रोजेक्ट लगाने की सोच रहे हैं तो आपके लिए यह एक बड़ी खबर है। केंद्र सरकार ने देश में इथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न सहायता योजनाओं के तहत पात्र इथेनॉल परियोजनाओं के लिए 4,687 करोड़ रूपये की ब्याज सब्सिडी (Interest Subvention) को मंजूरी दी है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने हाल ही में संसद (राज्यसभा) में यह जानकारी साझा की है।
         इस योजना के तहत सरकार योग्य परियोजनाओं को 6% वार्षिक ब्याज सब्सिडी या बैंकों द्वारा लिए जा रहे ब्याज का 50% (जो भी कम हो) वहन करती है। यह वित्तीय सहायता 5 वर्षों के लिए उपलब्ध कराई जाती है, जिसमें 1 साल का मोरेटोरियम (ऋण स्थगन अवधि) भी शामिल है। सरकार ने साल 2022-23 से अब तक नाबार्ड (NABARD) को 2,075 करोड़ रूपये की राशि जारी कर दी है, जो इस सब्सिडी को वितरित करने वाली मुख्य एजेंसी है। यह योजना नए डिस्टिलरी (आसवनी) स्थापित करने और मौजूदा इथेनॉल प्लांट की क्षमता बढ़ाने, दोनों के लिए लागू है। इसमें गन्ने के साथ-साथ अनाज-आधारित (मक्का, चावल आदि) प्लांट भी शामिल हैं।
         सरकार का उद्देश्य कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना है। पेट्रोल में इथेनॉल मिलाकर भारत महंगे कच्चे तेल के आयात बिल में भारी कटौती करना चाहता है। भारत सरकार ने देश में 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग (E20 पेट्रोल) का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। इसके लिए सालाना 1,000 करोड़ लीटर से अधिक इथेनॉल की आवश्यकता होगी। इस नीति से गन्ना, मक्का और खराब हो चुके अनाजों की मांग बढ़ी है, जिससे किसानों को सीधे आर्थिक लाभ (ऊर्जादाता के रूप में) मिल रहा है। इस सब्सिडी और इथेनॉल नीति को लेकर हाल ही में राजनीतिक और उपभोक्ता स्तर पर कुछ चर्चाएं भी शुरू हुई हैं। विपक्ष और कुछ विश्लेषकों का आरोप है कि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (E20) से गाड़ियों का माइलेज कम होता है, जिससे आम जनता की जेब पर अतिरिक्त भार पड़ा है। उनका तर्क है कि करोड़ों की सब्सिडी का सीधा फायदा आम उपभोक्ताओं के बजाय कंपनियों और इथेनॉल उत्पादकों को अधिक मिल रहा है।
       केंद्रीय मंत्रियों जैसे कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और पेट्रोलियम मंत्री का कहना है कि इस कार्यक्रम से पिछले कुछ सालों में लाखों करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बची है और इस मूल्य श्रृंखला (खेत से लेकर फ्यूल टैंक तक) का सबसे बड़ा हिस्सा देश के किसानों तक पहुंच रहा है।

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