💥कभी चहचहाते चिड़ियों और पहाड़ी जल-स्त्रोतों से भरपूर था चिराईपानी, अब सूखे की कगार पर।
तहतक न्यूज/रायगढ़, छत्तीसगढ़। जिला मुख्यालय से चंद किलोमीटर दूर एक गाँव है "चिराईपानी"। नाम सुन कर जेहन में यही बात उठता है कि यहाँ कल-कल करती जल की धाराएं और उस पर निर्भर वन्य पक्षियों का कलरव सुनने को मिलता होगा तभी तो शायद इस गाँव का नाम चिराईपानी पड़ा होगा, लेकिन अब यह एक कोरी कल्पना के सिवा कुछ भी नहीं है।
बता दें कि आज की तारीख में यह गाँव पानी के लिए तरस रहा है। इस गाँव का प्रमुख जल-स्त्रोत बड़े तालाब सूखा पड़ा बारिश का इंतजार कर रहा है। इसे सौंदर्यीकरण और गहरीकरण के नाम पर लगभग तीन महीने पूर्व पूरी तरह से खाली करा दिया गया था, लेकिन आज तक इस तालाब की न तो खुदाई शुरू हुई और न ही सौंदर्यीकरण का कार्य हुआ। 45 डिग्री पार भीषण गर्मी में जहाँ पूरा गाँव बूंद-बूंद पानी के संकट से जूझ रहा है, तो वहीं वन्य पशु-पक्षी और जीव-जंतु इधर-उधर भटक रहे हैं या फिर मौत के शिकार हो रहे हैं।
रायगढ़-घरघोड़ा मुख्यमार्ग में स्थित ग्राम पंचायत लाखा के आश्रित ग्राम चिराईपानी के निवासियों के अनुसार पंचायत द्वारा तालाब गहरीकरण का प्रचार किया गया और तालाब का पूरा पानी निकलवा दिया गया। नियमों के अनुसार पानी खाली होने के तुरंत बाद खुदाई और निर्माण कार्य शुरू हो जाना चाहिए था, लेकिन तीन महीने बीतने के बाद भी स्थिति यथावत बनी हुई है।
ग्रामीणों का आरोप है कि बिना किसी ठोस कार्ययोजना, ले-आउट और समयबद्ध तैयारी के जल्दबाजी में तालाब खाली करा दिया गया, जिससे पूरे गाँव की जल व्यवस्था चरमरा गई। चिराईपानी का यह बड़ा तालाब ग्रामीणों और मवेशियों के लिए गर्मियों में सबसे बड़ा सहारा माना जाता था। तालाब सूखने के बाद अब ग्रामीणों को निस्तारी के लिए इधर-उधर भटकना पड़ रहा है, वहीं मवेशियों के लिए पानी की व्यवस्था करना भी मुश्किल हो गया है।
ग्रामीणों की मानें तो तालाब सूखने के बाद गाँव के कई हैंडपंप, बोरपम्प और कुएँ सूखने की कगार पर हैं। यह तालाब आसपास के भूजल स्तर को बनाये रखने वाला प्रमुख स्रोत था। लगातार तीन महीने तक सूखे रहने से जलस्तर नीचे चला गया है जिसके चलते अब पीने के पानी का संकट भी गहराने लगा है। जल संकट की इस गंभीर समस्या पर क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है।
बहरहाल, अब सवाल उठता है कि जहाँ शासन जल संरक्षण, भूजल संवर्धन और मनरेगा के जरिए ग्रामीणों को रोजगार देने के ढिंढोरा पीटती थकती नहीं है, जनता की हर छोटी-बड़ी समस्याओं के निराकरण के लिए सुशासन तिहार के तहत जगह-जगह समाधान शिविर लगाकर तत्काल निराकरण करती फिर रही है, वहीं रायगढ़ जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम पंचायत लाखा के आश्रित ग्राम चिराईपानी से इस प्रकार की प्रशासनिक लापरवाही, अनदेखी और संवेदनहीनता की नकारात्मक तस्वीरें क्यों सामने आ रही हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि यह केवल कागजों में कार्य दिखाकर शासकीय राशि के दुरुपयोग की तैयारी हो रही है? क्योंकि बारिश में जल भर जाने के बाद वास्तविक खुदाई का आकलन कर पाना मुश्किल हो जाएगा। ऐसे में पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली गंभीर सवालों के कटघरे में खड़ी नजर आ रही है।
बात तहतक की करें तो ग्रामीण क्षेत्रों में जन-कल्याणकारी योजनाओं के उपजाऊ जमीन में व्याप्त भ्रष्टाचार की मोटी-मोटी जड़ें इस कदर धंसी हुई हैं कि इन्हें निकाल पाना असंभव नहीं तो कठिन जरूर है।
दरअसल, आमतौर पर ग्रामीण सीधे-सादे, सरल हृदय और भीरू स्वभाव के होते हैं। यही कारण है कि वे जल्दी से विरोध नहीं करते और शातिर व चालाक अपने मनसूबे पर कामयाब हो जाते हैं। फिलहाल, अब देखना जरुरी होगा कि इस गंभीर मामले पर क्या कुछ कार्रवाई होती है? और कब तक होती है? या फिर जाँच के नाम पर नतीजा वही ढाक के तीन पात !



