तहतक न्यूज/रायगढ़, छत्तीसगढ़। सुरक्षा संस्कृति को बढ़ावा देने और सर्वोत्तम सुरक्षा प्रथाओं को साझा करने के उद्देश्य से एनटीपीसी लारा द्वारा नजदीक के कुछ गिने-चुने उद्योगों जैसे अडानी पावर लिमिटेड रायगढ़, जिंदल पावर लिमिटेड तमनार, जेएसडब्ल्यू स्टील, सनफ्लैग आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड के प्रतिनिधियों के साथ एक बैठक हुई।
बैठक के दौरान DDIHS रायगढ़ ने हाल ही की औद्योगिक घटनाओं से मिली सीख साझा की और एनटीपीसी लारा के सहयोगात्मक सुरक्षा कार्यक्रम आयोजित करने के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने अन्य उद्योगों को भी इस तरह की पहल करने के लिए प्रेरित किया, ताकि सुरक्षा संस्कृति को मजबूत किया जा सके और मानव जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित हो। उन्होंने उद्योगों को आपातकालीन परिस्थितियों में एक-दूसरे का समर्थन करने, उपलब्ध संसाधनों को साझा करने और मिलकर सुरक्षा कार्यक्रम जैसे कि मॉक ड्रिल, सुरक्षा ऑडिट, वेबिनार और जागरूकता अभियान आयोजित करने की सलाह दी, जिससे उद्योगों के बीच समन्वय और सुरक्षा जागरूकता बढ़ सके।
महाप्रबंधक (संचालन एवं रखरखाव) ने सहयोगात्मक प्रयासों, सर्वोत्तम प्रथाओं के आदान-प्रदान और आपातकालीन परिस्थितियों में आपसी समर्थन के महत्व पर जोर देते हुए अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि सामूहिक प्रयास और सक्रिय सुरक्षा भागीदारी एक मजबूत और सुरक्षित औद्योगिक वातावरण बनाने के लिए अनिवार्य हैं।
इस प्रकार एनटीपीसी लारा की यह पहल सुरक्षा संस्कृति को मजबूत करने और क्षेत्रीय औद्योगिक इकाइयों के बीच सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता को प्रदर्शित तो करती है, लेकिन इस महत्वपूर्ण बैठक में सबसे अहम मुद्दा पर्यावरण सुरक्षा पर कोई चर्चा नहीं हुई, जबकि इन्हीं तमाम उद्योगों की वजह से पूरा जिला भयानक प्रदूषण की मार झेलते हुए आज 45° डिग्री से ऊपर के तापमान की प्रचंड गर्मी में झुलस रहा है। इससे आम जन मानस को स्पष्ट प्रतीत हो रहा है कि क्षेत्र की नामी-गिरामी कम्पनियाँ भी केवल दिखावे के लिए मात्र औपचारिकताएं निभा रही हैं। बात तहतक की करें तो कथित सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने वाली कम्पनियाँ प्रदूषण के रोकथाम के उपायों पर अगर ईमानदारी से अमल करें तो उनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा चला जायेगा। यही कारण है कि 'पर्यावरण सुरक्षा' और 'प्रदूषण' का नाम सुनते ही इन्हें सांप सूंघ जाता है। प्रदूषण कम करने को लेकर शायद ही किसी कंपनी ने कोई सकारात्मक पहल किया हो। इतना जरूर है, साल में एक बार जुलाई-अगस्त के महीने में पौध रोपण करने की तस्वीरें देखने को मिल जाती हैं जिसे वे वृक्षारोपण की संज्ञा देते हैं ऐसा लगता है जैसे पौधा नहीं समुचा वृक्ष का ही रोपण कर देते हैं और बड़ा-बड़ा पोस्टर छपवाकर अपने हाथों अपनी ही पीठ थपथपा लेते हैं। बाद में उन पौधों का क्या हाल होता है सबको मालूम है।



