हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, नौ पुलिस कर्मियों को सुनाई फाँसी की सजा

तहतक न्यूज/मद्रास,तमिलनाडु। वर्तमान समय में जब भ्रष्टाचार सिर चढ़कर बोल रहा हो, न्याय पनाह मांगता फिर रहा हो, ऐसे समय में देश के एक उच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले ने जनता की उम्मीदों को फिर से जगा दिया है। बता दें कि मद्रास हाईकोर्ट ने 06 अप्रैल 2026 को महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए 09 पुलिसकर्मियों को मौत की सजा सुनाई है। यह मामला 2020 के चर्चित सथानकुलम कस्टोडियल डेथ से जुड़ा है, जिसमें जून 2020 में कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान, पुलिस ने मोबाइल दुकान खोलने के आरोप में पी. जयराज (58 वर्ष) और उनके बेटे जे. बेनिक्स (31वर्ष) को हिरासत में लिया था।
            हिरासत के दौरान दोनों को पुलिस स्टेशन में बुरी तरह प्रताड़ित किया गया था, जिससे उनकी मौत हो गई थी। इस केस ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था और साथ ही कानून व्यवस्था और मानवाधिकारों पर गंभीर सवाल खड़े किए थे। कोर्ट ने इस मामले में आरोपियों को फांसी की सजा सुनाते हुए इसे रेयरेस्ट ऑफ रेयर केस बताया और कहा कि यह अपराध सत्ता के दुरुपयोग और अमानवीय क्रूरता का उदाहरण है। यह फैसला भारत में पुलिस जवाबदेही और हिरासत में हिंसा के खिलाफ एक बड़ा संदेश माना जा रहा है।
पुलिस ने पिता-पुत्र की हाथ पैर बांधकर बेरहमी से की पिटाई
छह सालों तक चले ट्रायल के बाद न्यायमूर्ति जी. मुथुकुमारन ने 59 वर्षीय व्यापारी पी. जयराज और उनके 31 वर्षीय बेटे जे. बेनिक्स की मौत के मामले में  जांच एजेंसी सीबीआई की इस दलील को स्वीकार किया है कि पुलिस हिरासत में पिता-पुत्र के साथ किया गया टॉर्चर कोई अचानक हुई घटना नहीं, बल्कि सोची-समझी साजिश थी। दोनों पिता-पुत्र को बारी-बारी से लकड़ी की बेंच पर गिराकर उनकी पिटाई की गई थी। इस दौरान पीड़ितों के शरीर पर सिर्फ अंडरवीयर था और उनके हाथ-पैर बांध दिए गए थे। जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आया कि दोनों पीड़ितों के शरीर पर करीब 18 गंभीर चोटें थीं, जिसके चलते उनकी मौत हुई।
दस पुलिकर्मियों पर था आरोप
इस मामले में कुल 10 पुलिसकर्मियों पर आरोप था, जिनमें से 09 को कोर्ट ने मौत की सजा सुनाई है। इन लोगों में इंस्पेक्ट एस. श्रीधर, सब-इस्पेंक्टर पी. रघु गणेश और के. बालकृष्णन, हेड कांस्टेबल एस. मुरुगन और ए.समदुरई और कांस्टेबल एम. मुथुराज, एस. चेल्लादुरई, एक्स. थॉमस और एस. वेलुमुथु शामिल हैं। इनके अलावा स्पेशल सब-इंस्पेक्टर पॉलदुरई भी इस आरोप में शामिल था लेकिन कोविड-19 के दौरान उसकी मौत हो गई।
टार्चर के दौरान खुद पीड़ितों से साफ करवाया उनका खून
जांच में यह भी सामने आया कि पुलिसकर्मियों ने पीड़ितों को अपने खून को खुद साफ करने के लिए मजबूर किया था। पीड़ितों की हालत इतनी गंभीर हो गई थी कि उनके कपड़े कई बार बदलने पड़े। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार  मौत का कारण टॉर्चर से हुई गंभीर अंदरूनी चोटें थीं। जांच में यह भी सामने आया कि आरोपियों ने सबूत मिटाने की कोशिश की और घटना को छिपाने के लिए झूठा मामला दर्ज किया। जब न्यायिक अधिकारी मौके पर पहुंचे तो पुलिसकर्मियों ने सहयोग करने में टाल-मटोल की। यही नहीं, कुछ ने तो सबूत सौंपने से इनकार कर किया और जांच टीम को डराने की भी कोशिश की।
        बात तहतक की करें तो आधुनिक युग में इंसान की पहुँच भले ही कथित विकास के उच्चतम सोपानों तक हो गयी हो, लेकिन पद के घमंड में चूर पाशविक प्रवृत्ति की ओर उसका झुकाव कहीं अधिक नजर आ रहा है। आम इंसान को भेड़ बकरियों से ज्यादा कुछ नहीं समझता। यही वजह है कि कमजोर और गरीब की जिंदगी गुलामों से भी बदतर हो गयी है।
        फिलहाल उच्च न्यायालय के इस ऐतिहासिक निर्णय ने आम लोगों की निराशा में आशा की एक नई किरण को जन्म दिया है। ऐसे ही ठोस और न्यायपूर्ण फैसले होते रहें तो निश्चित ही बढ़ते अपराधों पर अंकुश तो लगेंगे, अपराधियों में भी कानून का डर पैदा होगा।

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