
तहतक न्यूज/खरसिया-रायगढ़, छत्तीसगढ़। यह सर्व विदित है कि उद्योगों को जहाँ वे स्थापित हैं, वहाँ के स्थानीय जनता के लिए सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत सामाजिक हित के कार्य कराने होते हैं। इसी क्रम में जिले के खरसिया विकासखंड के ग्राम टेमटेमा में स्थित स्काई एलॉयज एण्ड पावर लिमिटेड द्वारा क्षेत्रीय ग्रामीणों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर और दवा वितरण कैंप का आयोजन किया जा रहा है। यह शिविर 14 फरवरी को ग्राम सेंद्रीपाली मिलन चौक में आयोजित होगा। इस शिविर में कंपनी के डॉ. टेकलाल पटेल (नाक, कान, गला विशेषज्ञ), डॉ. प्रभु नारायण प्रधान (एम.बी.बी.एस, एफआईएच) तथा सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, चपले के जनरल प्रैक्टिशनर अपनी सेवाएं देंगे। साथ ही मरीजों को निःशुल्क दवाइयां भी उपलब्ध कराई जाएंगी। कंपनी प्रबंधन ने क्षेत्रीय ग्रामवासियों से अधिक से अधिक संख्या में शिविर का लाभ उठाने की अपील की है।
स्काई एलायज एन्ड पॉवर लिमिटेड का यह जन-कल्याणकारी सेवा निश्चित तौर पर सराहनीय है। आमतौर पर देखा गया है कि ग्रामीण खासकर आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति विशेषज्ञ चिकित्सकों से इलाज कराने दूर शहर नहीं जा पाते। ऐसे में उन्हें यदि अपने ही गाँव में निःशुल्क चिकित्सा और दवाएँ मिल जाय तो उनके लिए यह किसी वरदान से कम नहीं होगी।
फिलहाल, इस स्वास्थ्य शिविर को लेकर ग्राम सेंद्री पाली तथा आसपास के ग्रामीणों में हर्ष का माहौल देखा जा सकता है, लेकिन जिले के कुछ अन्य औद्योगिक क्षेत्रों की बात करें तो कई कम्पनियों द्वारा स्वास्थ्य शिविर का लाभ देना तो दूर, उलटे बीमारियाँ परोसी जा रही हैं। कुछ ऐसे भी कंजूस उद्योग हैं जो अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वहन करने में कोताही बरत रही हैं।
उल्लेखनीय है कि जिला मुख्यालय से कुछ ही कि.मी. दूर ग्राम पंचायत लाखा और चिराईपानी के निवासी सर्वाधिक प्रदूषण की मार झेल रहे हैं, लेकिन आसपास स्थापित उद्योग अपने सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने में कोई रूचि नहीं ले रहे। स्थानीय निवासियों की मानें तो क्षेत्र में मुख्य रूप से सुनील इस्पात, श्री ओम रुपेश, वजरान, महालक्ष्मी, सालासर (अब सिंघल) अग्रोहा जैसी बड़ी कम्पनियाँ दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रही हैं, पर्यावरण नियमों की धज्जियाँ ही नहीं अंधेरा होते ही ईएसपी बंद कर पूरी रात धुर्रा उड़ा रहे हैं। लोग सर्दी, खाँसी, चर्म तथा साँस रोग जैसे गंभीर बिमारियों से जूझ रहे हैं। बच्चों और महिलाओं की एड़ियाँ फट रही हैं। घर के अंदर कपड़े, बिस्तर,कीमती सामान, जहाँ देखो जहाँ छुओ वहीं काला डस्ट जमा हुआ है, फिर भी स्वार्थी कम्पनियों की चिमनियाँ जहर उगलने से बाज नहीं आ रही हैं। पर्यावरण विभाग रात में आकर देखे तो पता चले कि यहाँ आसमान में तारे नहीं जहरीले बादल दिखाई देते हैं। लोग यहाँ घुटन भरी हवा में किस कदर साँस ले रहे हैं और बद से बदतर जिंदगी जीने को मजबूर हैं इसकी किसी को कोई चिंता नहीं है। लाखा वासियों के इस मुसीबत का एक और सबसे बड़ा जिम्मेदार केलो परियोजना है जिसने इनकी जमीनें लेकर ऐसे जगह पर बसाहट दे दी जहाँ लोग घुट-घुट कर जी रहे हैं। इसे तो अंग्रेजों के “कालापानी” की सजा से कहीं अधिक खतरनाक सजा “कालाहव्वा” का नाम दें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
